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HISTORY OF HINDI LITERATURE
0/34
Environmental Studies
English Language and Linguistics
Introduction to Mass Communication
Private: BA Hindi
About Lesson

इकाई : 3

रीतिमुक्त परम्परा और उसके प्रमुख कवि

Learning Outcomes / अध्ययन परिणाम

  • रीतिमुक्त काव्य के वर्गीकरण समझता है ।
  • रीतिकालीन काव्य के परिप्रेक्ष्य में रीतिमुक्त काव्य का सामान्य परिचय प्राप्त करता है ।
  • रीतिमुक्त काव्य के स्वरूप समझता है ।
  • रीतिकालीन कविता में रीतिमुक्त काव्य के महत्व का परिचय प्राप्त करता है ।
  • रीतिमुक्त काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करता है ।
  • रीतिमुक्त प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं का परिचय प्राप्त करता है।

Prerequisites / पूर्वापेक्षा

    रीतिमुक्त काव्य परंपरागत काव्यरचना के नियमों से मुक्त रहनेवाली काव्यधारा है, जिसकी प्रवृत्ति स्वछंद थी । रीतिमुक्त
कवियों ने अपने नवीन और क्रांतिकारी दृष्टिकोण का परिचय दिया। उन्होंने काव्यशास्त्रीय नियमों एवं प्रचलित साहित्यिक परंपराओं को नकारा । वे रीतिबद्ध कवियों की तरह निश्चित नियमों में बँधने के स्थान पर उनसे मुक्त होकर काव्यरचना करते थे । उन्हें कविता की बँधी-बँधाई परंपरा पसंद नहीं था। उन्होंने अपनी अनुभूतियों को कविता के माध्यम से बहुत सहज रूप में व्यक्त करने का प्रयत्न किया है। वे बहुत उन्मुक्त और स्वछंदभाव से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के पक्षधर हैं।

Key Themes / मुख्य प्रसंग

    काव्य रीति के बन्धन से पूर्णतः मुक्त होकर रचना किये गये कवियों को रीति मुक्त कवि कहते हैं । इसे स्वछंद काव्यधारा
के नाम से भी जाना-पहचाना जाता है।

Discussion / चर्चा

    रीतिमुक्त कवि भी किसी न किसी राजाश्रय में ही रहते थे ,  पर वे अपने ऊपर आश्रयदाता के अनावश्यक दबाव  स्वीकीर नहीं करते थे। वे उनकी काव्याभिरुचियों से प्रभावित हुए बिना अपने रचनाकर्म में लीन रहते थे। इस काव्यधारा के कवियों नें अपनी तीव्र अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए काव्य को एक साधन या माध्यम के रूप में स्वीकार किया। रीतिमुक्त कवियों की काव्याभिव्यक्ति में भाव और कला का सुंदर समन्वय प्राप्त होता है। यहाँ रीतिमुक्त काव्यधारा की कतिपय प्रमुख विशेषताओं के आलोक में उसका मूल्यांकन किया जाना अपेक्षित है।

6.3.1 रीतिमुक्त काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

    रीतिमुक्त कवियों ने स्वयं को काव्यरचना के शास्त्रीय नियमों- बंधनों में सीमित न करते हुए उन्मुक्त और स्वछंद रूप में काव्याभिव्यक्ति की है। उनकी कविताएँ उनके हृदय से सहज रूप में प्रस्फुटित हुई हैं, जिनमें उनके जीवन के विविध अनुभवों की झाँकी दिखाई देती है। तमाम साहित्यिक रूढ़ियों का परित्याग कर नवीन मार्ग का अनुगामी होने के कारण रीतिमुक्त कवियों की रचना में विशिष्टता प्रकट होती है। इस धारा के कवियों ने प्रेम की तीहृु िअनुभूति को व्यक्त करने के साधन के रूप में काव्य को एक माध्यम माना। रीतिमुक्त काव्यधारा की सामान्य प्रवृत्तियाँ निम्नवत रेखांकित की जा सकती हैं।

 प्रेम का स्वछंद  चित्रण

रीतिमुक्त काव्यधारा के कवियों ने तीव्र प्रेमानुभूति को बहुत स्वछंद और उन्मुक्त भाव से सहज रूप में अभिव्यक्त किया है। इन कवियों ने एक सच्चे प्रेमी की तरह उत्कट प्रेम का अनुभव किया था।  प्रेम में संयोग-वियोग की जैसी तीत्र अनुभूति इन कवियों को ही,वही कविता बनकर फूट पड़ी।

प्रेम के लौकिक पक्ष का चित्रण

    रीतिमुक्त कविताओं में प्रेम के लौकिक पक्ष को बहुत सफल अभिव्यक्ति मिली है, क्योंकि इस धारा के कवियों ने प्रेम
के लौकिक पक्ष को बहुत व्यापकता के साथ आत्मसात कर लिया था। प्रेम की लौकिकता की अनुभूति जन्य विवशता और
व्यथा का मार्मिक चित्रण रीतिमुक्त कवियों ने बहुत स्वाभाविक रूप में किया है।

6.3.2 प्रमुख रीतिमुक्त कवि एवं उनकी रचनाएँ
6.3.2 .1 घनानंद
रीतिमुक्त कविता के सर्वोच्च कवि हैं घनानंद। वे प्रेम की पीड़ा के कवि कहे जाते हैं । घनानंद का जन्म 1689 ई.
में हुआ। ये दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के यहाँ मीर मुंशी थे । वे जाति के कायस्थ थे। ये सुजान नामक वेश्या से प्रेम
करते थे।
घनानन्द की रचनाएँ – ‘सुजान हित’(इसमें 507 पद हैं।),”सुजान सागर”, “सुजान शतक”, “विरहलीला”, “लोकसार”,
“रसकेलिवल्ली”, “कृपाकाण्ड”, “विरहलीला”, ‘इश्कलता’, ‘प्रेमपत्रिका’, ‘वियोगबेलि’, ‘प्रेंमसरोवर”, “ब्रजविलास”,
“रसवसंत”, “यमुनायश” आदि कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं ।
घनानंद की काव्य दृष्टि
घनानंद सरल, सहज भाषा के कवि हैं। ब्रजभाषा का माधुरी उनकी कविता की विशेषता है । घनानंद के काव्य में
श्रृंगार रस की प्रधानता है। श्रृंगार के दोनों ही पक्ष संयोग और वियोग का निरूपण उनके काव्य में हुआ है।

घनानंद की विरहानुभूति

    घनानन्द भावना के कवि थे । कवि के रूप में घनानन्द ने अनुभूति से मित्रता की थी, ज्ञान से नहीं । यही कारण है कि उनकी महत्ता अनुभूति, भावना और सौंदर्य के कारण ही अधिक है। एक प्रकार से उनकी कविता उनके
व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। भाषा का सौंदर्य, कल्पना की सूक्ष्मता, वैयक्तिक अनुभूतियों का ईमानदार निरूपण और
प्रेममार्ग की विशिष्टता और सरलता जैसी प्रवृत्तियों ने घनानन्द को एक श्रेष्ठ कवि के रूप में प्रामाणित करती है।
अन्य कवि
आलम – ‘आलमकेलि’
बोधा – ‘विरह वारीशे’
ठाकुर – ‘ठाकुर ठक्षको’
द्विजदेव – ‘श्रृंगारलतिका’, ‘श्रृंगार बत्तीसी’

Critical Overview / आलोचनात्मक अवलोकन

रीतिकालीन समयसीमा में उपलब्ध काव्यसर्जन को जिन प्रमुख दो वर्गों में विभक्त करने का प्रयास किया गया है,
वे हैं –
रीतिबद्ध और रीतिमुक्त । इससे पूर्व आचार्य शुक्ल ने रीतिकाल के कवियों को रीतिग्रंथकार कवि एवं उनसे इतर को अन्य कवि के रूप में रखने का आग्रह किया था। रीतिबद्धता इस काल की प्रमुख प्रवृत्ति होने के कारण जिन कवियों की रचनाएँ काव्यांग विवेचन की परिधि में आती हैं, उन्हें रीतिबद्ध कवि कहते हैं । इस काल के अन्य कवि जो रीतिबद्धता की परिधि का स्पर्श ही नहीं करते, उन्हें रीतिमुक्त कवि कहने लगा।

Recap / पुनरावृत्ति

  • रीतिमुक्त काव्यधारा स्वछंद भावाभिव्यक्ति के रूप में अपनी अलग पहचान बनाती है।
  • रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्य धारा के विभाजन का श्रेया आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र को दिया जा सकता है।
  • रीतिमुक्त कवियों में रीति का कोई विधान या तत्व नहीं है।
  • इन कवियों की काव्यरचना का फलक बहुत व्यापक और उच्च भावभूमि पर उपस्थित है।

Objective Questions / वस्तुनिष्ट प्रश्न

  1. प्रमुख रीतिमुक्त कवि का नाम लिखिए?
  2. घनानन्द की एक प्रमुख रचना का नाम लिखिए?
  3. तीन रीतिमुक्त कवियों का नाम लिखिए?
  4. ‘आलमकेलि’ किसकी रचना है?
  5. विरह वारीशे’ किसकी रचना है ?
  6. ‘ठाकुर ठक्षको’ किसकी रचना है?
  7. घनानन्द की अन्य तीन रचनाओं का नाम लिखिए?
  8. किसे प्रेम की पीड़ा के कवि कहे जाते हैं ?

Answer / उत्तर

  1. घनानन्द
  2. सुजान
  3. आलम, बोधा, ठाकुर |
  4. आलम की |
  5. बोधा की
  6. ठाकुर की
  7. ‘वियोगबेलि’, ‘प्रेंमसरोवर,  व्रजविलास |
  8. घनानंद को |

Assignment / प्रदत्तकार्य

  • रीतिमुक्त कवि घनानन्द की विशेषताओं पर टिप्पणी तैयार कीजिए  ?

Self Assesment / आत्म मूल्याकन

  • आपके राय में प्रमुख रीतिमुक्त कवि कौन है ?